Monday, February 8, 2016


सोलो डे

(लंबी कहानी, पांचवीं कड़ी)

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"भईया, आप मेरी जगह होते, तो क्या करते?"
मेरे यहां आने पर वो भरसक ख्याल रखता था कि सिगरेट के धुंए से मुझे परेशानी ना हो. इस वक्त वह खुली खिड़की के पास कुर्सी लगा कर सिगरेट के साथ चाय सुड़क रहा था. फेफड़े के धुएं को मुंह के रस्ते खिड़की के बाहर उछालने के बाद उसने यह सवाल मेरी तरफ उछाल दिया था.
"पता नहीं..." मुझे हाईपोथैटिकल सवालों से शुरू से कोफ्त होती है, इसलिए मैंने बिना माथा-पच्ची किए कहा.
"विपाश्यना बोले तो आईसोलेशन में जाने के बारे में आपका क्या ख्याल है?" सिगरेट का अंतिम कश लगाने के बाद अब वह बचे हुए टोटे को ठिकाने लगाने की जगह खोज रहा था और इस काम के दौरान भी उसके दिमाग ने मेरे लिए नया सवाल उपजा लिया था. मैं थोड़ी देर तक सोचता रहा.
"काटने पर भी मच्छर को ना मारूं, यह मुझसे नहीं होगा. घर-परिवार से कट के रहना...सोच कर ही जी घबराता है. ना मुझे टाइम से भूख लगती है और ना ही मैं हिसाब रख कर खाता हूं. साधू-सन्यासी बनने का साहस मुझमें तो नहीं." बचे हुए टोटे को उसने चाय के खाली हो चुके प्याले में ही ठिकाने लगा दिया था और फिलहाल मेरा जवाब सुनकर मुस्कुरा रहा था.

अगला दिन रविवार था. वह घंटों तक पुस्तक मेले से मेरी लाई क़िताबों के ढेर के साथ उलझा रहा, शायद कुछ पसंद की किताबें छांट रहा था. फिर उसने घर पर बात की. मेरी हार्ड ड्राइव उठाई और मेरे और टीवी पर चल रहे भारत-ऑस्ट्रेलिया के वन-डे मैच के बीच में आकर खड़ा हो गया.
"15 दिन ज़िंदा रहने के लिए कितने मैगी के पैकेट रखने पड़ेंगे." मेरे जी में आया कि रिमोट उसके सर पर दे मारूं, पर किसी तरह अपने गुस्से पर काबू किया.
"भाई मेरे, मैथ्स और रिजनिंग मेरे बस की होती, तो तुझ जैसों के साथ कलम से कहानियां नहीं बना रहा होता." मैंने खीज कर कहा.
"कोई गल नहीं, मत बताओ. चलो बाय!" इतना कह कर वह दनदनाते हुए दरवाज़े की तरफ चल पड़ा. मैं कुछ पूछ पाता इससे पहले ही दरवाज़े के पास पहुंच कर ठिठका और बिना मेरी तरफ देखे ही बोला-
"15 दिन के लिए आइसोलेशन में जा रहा हूं. मेरी खोज-ख़बर लेने की ज़रूरत नहीं है. मोबाइल तुम्हारे पास ही पड़ा है. तुम्हारी कुछ किताबें और हार्ड ड्राइव लेकर जा रहा हूं. ज़िंदगी और मौत का मामला हो, तभी तंग करना." इसके बाद वह चला गया.

 जब से उसकी नींद की गोली खाने की नई आदत का पता चला था, मैं उसे लेकर काफी सतर्कता बरतने लगा था. इसलिए, दो दिन तक जब वह सच में दिखाई नहीं दिया, तो मुझे उसकी चिंता होने लगी. उस दिन दफ्तर से लौटते वक्त बाइक का हैंडल बरबस ही उसके घर की तरफ जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया. जनाब घर की सीढ़ियों के पास ही मिल गए. कहने लगा कि आइसोलेशन में ही हूं, बस सिगरेट खत्म हो गई थी. मुझे बड़ी हंसी आई.

उस रात मैं उसके कमरे पर पहली बार रुका. उसके हाथों की बनी मैगी भी खाई, पर वह मुझसे ना के बराबर ही बोला. फिर वो अपनी चारपाई पर जाकर पसर गया. वह रह-रह कर करवटें बदलता था. यकीनन वो सोने का नाटक कर रहा था. मेरी आंखों में भी नींद नहीं थी. मैं काफी देर तक उसे यूं तड़पता देखता रहा. वह वाकई अकेला ही तो था. थोड़ी देर बाद मैं इस सोच में खो गया कि अगर मैं वाकई उसकी जगह होता, तो क्या करता?

(क्रमश:)

Saturday, February 6, 2016


स्टोरी डे

(लंबी कहानी, चौथी कड़ी)

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हमारी दोस्ती 'जय' और 'वीरू' टाइप नहीं थी. क्योंकि ना तो मैं उतना संजीदा था और ना ही वो उतना दिलफेंक. 'कृष्ण' और 'सुदामा' से भी इसकी तुलना जायज नहीं कही जा सकती. सबसे बड़ा फर्क तो यही था कि हम हाड़-मांस से बने साधारण इंसान थे. इसके अलावा हम दोनों मध्यवर्गीय परिवार से ही आते थे और कमाई के मामले में उन्नीस-बीस का ही अंतर था. शायद हमारी दोस्ती 'बिल गेट्स' और 'स्टीव जॉब्स' जैसी थी. मैं उसकी जीवन की त्रासदियों में अपनी कहानी ढूंढ लिया करता और वो दुनिया से अपनी बेबाक रचनाओं के बूते नया पंगा लेने की जुगत में लगा रहता. हम दोनों दुनिया से अपने-अपने ढंग से संवाद करते और जहां मौका मिलता एक-दूसरे को वैचारिक मतभेदों से भेद डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते. पर आज जब प्यार में चोट खाकर वह असहाय होकर तड़प रहा था, तो हमारी नजदीकियां आपसी रिश्ते को नया नाम देने की उधेड़बुन में खोई हुई थीं.

उसने हॉस्पिटल में एडमिट होने से इंकार कर दिया था, सो उसे उठा कर अपने यहां ली ले आया था. दवाईयां अब तक ठीक से अपना असर नहीं दिखा पाई थीं. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था और कमजोरी की वजह से उसे बार-बार चक्कर भी आने लगे थे. इस बीच मैंने बॉस से कह कर 'वर्क टू होम' ले लिया था और दिन-रात उसी की देखभाल में लगा था.

उस रात मैं उसके माथे पर गीली पट्टियां रख कर बुखार उतारने की कोशिश में लगा था, जब उसने आंख मूंदे हुए ही अपनी कहानी बतानी शुरू की.

"हमारा प्यार शुरू से ही बेमेल था. वो सबकुछ मानने वाली लड़की थी, मैं हर चलन से विरोध जताने वाला लड़का था. उसे दुनिया को इसकी मौजूदा विसंगतियों के साथ स्वीकार करने की कला आती थी, वहीं मैं दुनिया बदलने के ख्वाब अब तक देखता हूं. हमारा अलग होना शायद पहले से तय था. क्योंकि हम दोनों में एक ही समानता थी कि हम अव्वल दर्जे के ज़िद्दी थे."

इतना कहने के बाद वह थोड़ी देर के लिए चुप्प हो गया. उसकी बंद आंखों के कोर से एक-एक करके कई बूंदें निकलने लगीं और पानी की एक लकीर सी बनाती हुई बिस्तर में कहीं गुम होने लगीं. भीगी पट्टी को उसके सिरहाने रख, मैं उसके सीने को अपने हाथों से हौले-हौले सहलाने लगा. कुछ पल बीते होंगे, जब उसके होठों पर एक दर्द भरी मुस्कान उभर आई और उसने हल्की सी आह भर कर दोबारा बोलना शुरू किया-

"प्यार करने वालों के साथ यही सबसे बड़ी दिक्कत है. पहले तो उन्हें अपने साथी का अलग स्वभाव अनूठा लगता है, पर बाद में यही अंतर अलगाव की वजह बनने लगता है. अक्सर जब दो प्यार करने वालों की जिद उनकी मोहब्बत से ज्यादा ताक़त पा जाती है, तो मज़बूत से मज़बूत रिश्ता भी टूट कर बिखर जाता है. हमारे साथ भी यही हुआ."

इसके बाद उसने आगे कुछ भी नहीं कहा. धीरे-धीरे उसकी सांसे आश्चर्यजनक रूप से सामान्य होने लगीं, बदन पसीना छोड़ने लगा और उसकी आंखें शिथिल पड़ती चली गईं. शायद उसने अब तक एक अनकही कहानी का बोझ अपने सीने पर लाद रखा था, जो बुखार की शक्ल में अब उतर चुका था.

(क्रमश:)

Thursday, February 4, 2016


स्लैप डे
(लंबी कहानी, तीसरी कड़ी)
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सुबह से दो बार उसकी मां का फोन आ चुका था. दफ्तर गया तो पता चला कि वो आज भी काम पर नहीं आया है. तरह-तरह के बुरे ख्याल मन में आने लगे. ग़लती मेरी ही थी, मुझे उसका मोबाइल फोन यूं अपने पास नहीं रखना चाहिए था. अब उसकी मां को क्या जवाब दूं? पर आखिर वो गया कहां? वैसे तो शाम से लेकर देर रात तक रोज कभी भी आकर मेरे घर का डोर बेल बजा ही देता था. कहीं ज़हर तो नहीं खा लिया? चूहा मारने की दवा तो उसके डेरे के बाजू वाले राजू किराना स्टोर में मिलती ही होगी? वहां नहीं तो मोर या रिलायंस फ्रेश से "हिट" तो खरीद ही सकता है. नहीं, वो इतना कमजोर नहीं. ज़रूर बाइक पंक्चर हो गई होगी. या ठंड की वजह से बाइक की बैट्री डाउन हो गई होगी और सेल्फ स्टार्ट काम नहीं कर रहा होगा. ढंग से किक मारना भी तो उसे नहीं आता. पर अब तक तो उसे फिर भी ऑफिस आ जाना चाहिए था. साढ़े बारह होने को हैं. ओला, उबर, ऑटो इतने तो ऑप्शन हैं. वैसे तो टाइम पर ही आता था, लेकिन जो हुआ उसके बाद उसे किसी भी तरह की पाबंदी की परवाह नहीं रह गई है. उसकी लेटलतीफी की बढ़ती आदत से बॉस से लेकर उसके कलिग तक नाराज़ होने लगे हैं. वो तो कहिए कि उसके काम का पिछला रिकॉर्ड इतना अच्छा है कि सब अब तक बर्दाश्त कर रहे हैं.
लंच की बेल बजी, तो मैं अपना टिफिन कैरियर लेकर कैंटीन की तरफ चल पड़ा. मन ठीक ना हो, तो अंडा करी भी आलू के बासी चोखे जैसी लगती है. जैसे-तैसे खाना निपटाया. पर दिमाग उसी के बारे में सोचता रहा. उसके रूम में तो पंखा भी नहीं है. लटक के को मर नहीं सकता. पट्ठे ने 'एसी' लगा रखा है, फिर भी मेरे घर पर आकर सोता है. खाना भी बाहर ही खाता है, इसलिए छूरी भी शायद उसके रूम पर ना ही हो. दाढ़ी भी इलैक्ट्रिक ट्रीमर से बनाता है, तो ब्लेड भी नहीं रखता होगा. मतलब, गले या कलाई की नस काट लेने के चांसेज़ भी ना के बराबर ही हैं. लेकिन, नस तो खिड़की का कांच तोड़ कर उससे भी काटी जा सकती है. मैं सिहर उठा. खुद पर बहुत गुस्सा आया, पर फिर भी उसके बारे में अंट-शंट ही सोचता रहा. मैंने ऑफिस के व्हाट्सअप ग्रुप पर एक मैसेज छोड़ा और चुपचाप उसके 'रूम' के लिए निकल पड़ा.

तीन मंजिला इमारत के टॉप फ्लोर पर छत के एक हिस्से पर बना छोटा सा कमरा था. दरवाज़े के पास पहुंच कर मैंने उसका नाम लेकर आवाज़ लगाई. पिछली बार आया था, तो उसकी गर्लफ्रेंड से यहीं पहली और आख़िरी बार मिला था. इसलिए, बेधड़क दरवाज़ा खटकाने की हिम्मत नहीं हुई. दरवाजे पर हाथ रखा तो वह भीतर की तरफ खुलता चला गया.

वह वहीं था. पटरे वाली छोटी सी चारपाई पर रजाई ओढ़े किसी लाश की तरह पड़ा हुआ था. वह शायद कराह रहा था या फिर उसके सीने का बलगम बज रहा था. मैंने हल्के से आवाज़ दी, पर उसके जिस्म में किसी भी तरह की हरकत नहीं हुई. मेरा जी एक बारगी जोर से घबराया. कहीं ये मरने वाला तो नहीं. पता चला कि मैं ही पुलिस-वुलिस के चक्कर में फंस जाऊं. मन हुआ की लौट चलूं. पर ये संस्कार साले ऐसे समय पे ही पांव पकड़ लेते हैं. धीरे से रजाई हटाई. उसकी सांसे चल रही थीं. सिर पर हाथ धरा, तो तेज तपिश महसूस हुई. शायद बेहोश था. नहीं, उसने नींद की गोलियां ली थीं. गोलियों की एक पूरी पत्ती उसके सिरहाने रखी थी. मैं पास रखे मयूर जग से पानी भर लाया. उसके चेहरे पर छिड़का, तो उसने धीरे-धीरे आंखें खोल दीं. मैंने गिलास को उसके होठों से सटा दिया. उसे होश आ गया था, पर मुझसे आंखें चुरा रहा था. मैं उसके बगल में चारपाई पर ही बैठ गया. मेरी भी समझ में नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं. लेकिन चुप्पी मुझे काट खाए जा रही थी.

"बुखार में नींद की गोली खाता है कोई भला?" मैंने हल्की नाराज़गी से कहा. उसने गर्दन घुमा ली और बंद खिड़की को घूरने लगा.
"डॉक्टर के पास चलें?" पता नहीं क्यों इस सवाल पर उसने अपनी आंखें जोर से भींच लीं. मुझे बड़ी खीज हुई. मैंने इस बार तेज आवाज़ में पूछा-
"क्या चाहते हो?" उसने किसी रोबोट की तरह एक झटके में अपनी गर्दन घुमाई और मेरी तरफ देख कर चीख पड़ा-
"मर जाने दो मुझे, प्लीज़"
"तड़ाक"
मैंने उस दिन उस पर हाथ क्यों उठाया, मैं आज तक समझ नहीं पाया. बस इतना जानता हूं कि उसके गालों पर मैंने अपना गुस्सा नहीं निकाला था. वर्ना भला हम अगले ही पल गले लग कर क्यों रोए होते?

(कहानी अभी बाकी है)

Tuesday, February 2, 2016


सिनेमा डे
(लंबी कहानी, दूसरी कड़ी)
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"तमाशा" देखते-देखते वह हिचकियां ले-ले कर रोने लगा था. फिल्म बीच में ही छोड़नी पड़ी. अकेले बैठ के आंसू बहाना अलग बात है, पर यूं सरेआम!!! मैंने उससे साफ-साफ कह दिया-
"कुछ दिन के लिए थिएटर में मूवी देखना छोड़ दो."
किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने के बजाए, वह मूक बधिर बन गर्म पराठे पर धीरे-धीरे पिघलते मक्खन के टुकड़े को ही घूरता रहा.
"एक बार मोबाइल दो ना, क्या पता उसकी कॉल आई हो या फिर कोई मैसेज आया हो." पराठा खाते-खाते अचानक उसे अपने मोबाइल की याद हो आई थी. मैं कसमसा कर रह गया. 'आम' के विमर्श में 'इमली' को घसीट लाना उसका नया शगल बनता जा रहा था. पर गुस्सा होने के बजाए, ना जाने क्यों मुझे उस पर बहुत तरस आया.
"मोबाइल को तो तू भूल जा. ऐसा कुछ होगा तो मैं बता दूंगा."
मैंने उसका मोबाइल छीन लिया था. मजबूरी थी. बार-बार मोबाइल चेक करता रहता था. वजह पूछने पर कहता कि उसे कॉल आने का भ्रम होने लगा है. नींद में भी रिंगटोन सुनाई देने लगी है.
इसके बाद हम साथ में कोई मूवी देखने नहीं गए. पर इस वाक्ये का एक दूसरा असर भी हुआ. अब वह अक्सर मेरे यहां आने लगा. मुझसे बोलने बतियाने नहीं, मेरे डेस्कटॉप का मूवी फोल्डर एक्सप्लोर करने. मैंने भी सोचा कि चलो ठीक ही है, मन बहले ना बहले कम से कम सरेआम रोकर अपनी फजीहत तो नहीं करवाएगा.
"भईया, कल श्मशान चलोगे?" आधी रात को पानी पीने के लिए किचन की तरफ जा ही रहा था कि उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई. पलट कर देखा, तो उसका चेहरा रजाई के अंदर ही था. मुझे लगा सपने में बड़बड़ा रहा है. पर पानी पीकर वापस लौट ही रहा था कि उसने दोबारा पूछ लिया.
"क्या बात हो गई." मैंने उसके करीब आकर आशंकित स्वर में सवाल किया.
"कुछ नहीं, बस आज 'मसान' देखी तो श्मशान जाने का जी किया." उसका चेहरा अब भी रजाई के अंदर ही था. मेरा सर बुरी तरह भन्ना गया. संस्कारों ने पांव पकड़ लिए, वर्ना एक लात तो उसे पड़ ही जाती.
अगले दिन हम हिंडन किनारे वाले श्मशान गए. कोई तीन लाशों को जलता हुआ देखा. वह खुश नज़र आ रहा था. वजह ना मैंने पूछी ना मुझे समझ आई.
अगली रात उसने वही किस्सा दोहरा दिया. बस इस बार उसकी चाहत जुदा थी.
"भईया, चमगादड़ भी तो ठंड में दांत किटकिटाते होंगे ना?"
पानी से भरा ग्लास पूरा गटकने के बाद मैंने बेपरवाही से कहा- "मुझे नहीं पता."
अगले ही पल वह रजाई फेंक कर यू खड़ा हो गया, जैसे शरीर में स्प्रिंग फिट हो.
"चलो ना देख के आते हैं." उसने मनुहार की.
उस रात हम सचमुच अपार्टमेंट के पास वाले नाले तक गए. कीकर और बबूल के झाड़ के पास मंडराने वाले चमगादड़ों की आवाज़ सुनने की नाकाम कोशिश की.
उसने खुशी से कूदते हुए घोषणा की "चमगादड़ ठंड में दांत नहीं किटकिटाते हैं." बाद में पता चला कि ये 'आंखों देखी' फिल्म का असर था.
फिर तो उसकी उट-पटांग हरकतों को जैसे पर लग गए. कभी 'शिप ऑफ थीसियस' देखने के बाद आंखें बंद करके कैमरे से तस्वीरें खींचने लगता, तो कभी 'मोटरसाइकिल डायरीज़' देखने के बाद अपनी बाइक के साथ कई दिनों तक गायब हो जाता.
एक दिन आते ही उसने कहा-
'थैंक्स भईया!'
अचानक उसके मुंह से थैंक्स सुनकर मेरा उत्सुक होना लाज़मी था. पर इस बार मैंने उसका खेल उसके साथ ही खेल दिया. गंभीरता ओढ़कर चुप्पी साधे रखी और हाथ में थमे अख़बार में आंखें यूं गड़ाए रखीं, जैसे दुनिया खत्म होने का समाचार पढ़ रहा होउं.
"थैंक्स भईया, बिना हैप्पी एंडिंग वाली फिल्मों से इंट्रोडक्शन करवाने के लिए." अपनी कृतज्ञता जता कर वह चला गया, शायद कोई दूसरी फिल्म देखने.
(कहानी अभी बाकी है.)


  

Monday, February 1, 2016

सिगरेट डे
(लंबी कहानी, पहली कड़ी)
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उसे पहचानना अब मुश्किल हो चला है. आंखें के खांचे खंडहर में बदल गए हैं और पुतलियां घुप्प अंधेरे में स्थिर खड़े प्रेत जैसी हो चली हैं. ये प्रेत भी शाम गहराते-गहराते सुलगने लगते हैं. जब से आंखों पर प्रेतों का साया पड़ा है, हंसी ने भी चेहरे की चौखट पर आना बंद कर दिया है. बहुत ज़रूरत पड़ने पर अब होठों से नहीं गले से हंसता है. इस खोखली हंसी से ही उसके फेफड़ों में बढ़ते बलगम के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है. मैंने एक दिन उसके काले पड़ते होठों को देख भावुकता से भर कर पूछा था-
"इतनी सिगरेट क्यों पीने लगे हो?"
पर उसने जवाब नहीं दिया. अब वो सवालों के जवाब देता भी कहां है. बस थोड़ी देर के लिए उसका चेहरा विकृत हो उठता है और आप जान जाते हैं कि उसने आपका सवाल वाकई सुना है.
"कहीं पगला तो नहीं जाएगा? हरकतें तो वैसी ही हैं." उसकी लंबी चुप्पियों से डर कर अक्सर अब मैं ऐसा सोचने लगा हूं.
आजकल हर बात पर भावुक हो जाता है. सिसकने लगता है. सोचा था कि जुदाई-विरह के गानों से दूर रहेगा, तो जो हुआ उसे भूलने लायक हो सकेगा. पर वो तो न्यूज़ चैनल देख कर भी रो पड़ता है. जब रुलाई थाम लेता है, तो पलट कर अजीब से सवाल पूछने लगता है. ये दुनिया ऐसी क्यों है? ये प्यार सच में कोई भावना है भी या बस इसका शोर है? सबकुछ झूठ होता है क्या? ...और फिर मुझ से किसी तरह के जवाब के उम्मीद किए बिना खुद ही थोड़ी देर कुछ-कुछ बुदबुदाता है. जेब से टटोल कर माचिस निकालता है और एक नई सिगरेट सुलगा लेता है.
"मेरी आत्मा में सूजन हो गई है, उसी को सेंकता रहता हूं." गले वाली हंसी के साथ पिरो कर उसने ये बात काफी दिनों बाद कही थी. दो हफ्ते पहले पूछे गए सवाल का जवाब कोई अचानक दे, तो समझने में टाइम लगता है. पर मैं समझ गया, क्योंकि प्यार का तजुर्बा तो सबको होता है ना. :D

(क्रमश:)

Wednesday, January 27, 2016

मिस्टर जुगाड़ू को बनाएं "मेक इन इंडिया" कैम्पेन का ब्रांड एम्बेसडर

उस दिन एकता कपूर मार्का सास-बहू सीरियल में नाहक सदमा खाकर चिल्लाने और सदाबहार जवानी धारण करने वाले किरदार की तरह ही मेरी भी चीख निकल गई, जब मैंने सुलेखा डॉट.कॉम का "मेरा नाम है जुगाड़ू" वाला विज्ञापन पहली बार देखा. मेरी भावनाएं वैसे ही आहत हो गईं, जैसे कीकू का एक्ट देख कर बाबा राम-रहीम के फॉलोवर की हुई होगी. असहिष्णुता की चिंताएं बिल्कुल आमिर और शाहरुख की तरह ही मेरी पेशानी पर चस्पां हो गईं. 

रहते होंगे लोग सत्य और ईश्वर की तलाश में, पर मैं तो बचपन से लेकर अबतक नए-नए जुगाड़ की तलाश में ही रहा हूं. बिना पढ़े पास होने का जुगाड़, परीक्षा दिए बिना नौकरी पाने के लिए जान-पहचान का जुगाड़, बिना नहाए सर्दी गुजार देने का जुगाड़, बिना दूध के चाय बना लेने का जुगाड़, बिना तार बांधे कपड़े सुखा लेने का जुगाड़ और तो और बिना प्यार-मोहब्बत के जिंदगी जीने का जुगाड़ तक खोजता-तलाशता रहा हूं. जुगाड़ मुझे विज्ञान से जोड़ता है. जुगाड़ पर यू-ट्यूबीय रिसर्च से ही जाना कि हेटमेट पहन कर भी प्याज काटा जा सकता है और अगर ट्वायलेट का कमोड रूमाल-मोजे-गंजी के कॉम्बिनेशन से जाम हो जाए, तो उसे झाड़ू, बोतल और पॉलीथीन की मदद से हटाया जा सकता है. जुगाड़ मुझे न्यूटन और आइंसटाइन से जोड़ता है. मेरा निजी मानना है कि रोहित वेमूला को ही अगर जो जुगाड़ से जीने की कला पता होती, तो आत्महत्या करने की नौबत आती ही नहीं. 

अब बताइए मिस्टर जुगाड़ू ने कौन सा ऐसा काम किया कि उसे अपनी पत्नी के ताने सुनने पड़ गए? कूलर की हवा का विकेंद्रीकरण करना आईपीसी की किस धारा या भारतीय परंपरा की किस लकोकती और मुहावरे के तहत अपराध या बेवकूफी की श्रेणी में आता है? या क्या यह घोर अन्याय नहीं है कि जो बंदा बाइक पर सोफा सजाकर औरतों को लिफ्ट दे, उसकी अपनी लुगाई ही उसे लिफ्ट ना दे ! 

हां, जुगाड़ कई बार फेल हो जाते हैं. पर कौन से आविष्कार एक बार में पूरे हो जाते हैं. इंसान का अब तक का सबसे बड़ा आविष्कार "पहिया" क्या जुगाड़ नहीं था? ज़रूर मिसेज़ जुगाड़ ने चिराग, जिन्न और अलाद्दीन की अरबी कहानी पर ज़रूरत से ज़्यादा यकीन किया होगा या फिर खुद को सिंड्रेला सरीखा मान लिया होगा. हो सकता है उनकी स्कूल यूनिफॉर्म का बटन अचानक कभी टूटा ही ना हो और उनकी मां-टीचर या सखी ने उसकी जगह सेफ्टी पिन कभी लगाया ही नहीं हो. खैर, मेरा कहना यह है कि जुगाड़ हमारे महान देश की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रहा है. दुनिया भले ही विश्वास की धूरी पर टिकी हो, पर इंडिया जुगाड़ से चलता है. इसलिए जुगाड़ की मान्यता के साथ किसी भी तरह की छेड़खानी को हमें अपनी अस्मिता पर हमला मानना चाहिए. 

"कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।"
इस कालजयी रचना में इक़बाल साहब ने जिस "कुछ" को डिफाइन नहीं किया था, वह "कुछ" दरअसल कुछ और नहीं बल्कि जुगाड़ है. जुगाड़ हमारे ख़ून में है. कोई आश्चर्य नहीं कि नेता जी से संबंधित जो गोपनीय दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उनमें भी उनका इक़रारनामा दर्ज हो कि अगर उन्होंने लोगों से ख़ून की जगह जुगाड़ मांगा होता, तो आज़ादी बहुत पहले मिल गई होती. अब बापू का "चरखा" ही क्या था? बताइए, इतना बड़ा जुगाड़ स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में रहा और आज आज़ाद भारत में जुगाड़ू सोच का इस तरह सरेटीवी माखौल उड़ाया जा रहा है.

तो जो कोई भी समाज और संस्कृति के ठेकेदार हैं जरा देह पर का गर्दा झाड़ के खड़ा हो जाएं. सरकार भी जरा संज्ञान ले. खाली "मेक इन इंडिया" का विज्ञापन करने से नहीं होगा, इस टाइप का प्रचार को भी रोकना होगा. हो सके तो आप लोग भी प्रेशर बनाइए, इंक्रेडिबल इंडिया कैम्पेन से आमिर ख़ान का पत्ता काट सकते हैं, तो फिर मिस्टर जुगाड़ू को "मेक इन इंडिया" कैम्पेन में सेट करना भी आपके अख्तियार में है.
जय जुगाड!

Monday, January 18, 2016

"मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से, प्रकृति से, लेकिन मैंने लोगों से प्यार किया और ये नहीं जान पाया कि वो कब के प्रकृति को तलाक़ दे चुके हैं. हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हो गई हैं. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारी मान्यताएं झूठी हैं. हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिए. यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों."

प्रिय रोहित,
जिस दुनिया से तुमने असमय विदाई ली है, वहां मर चुके लोगों को पत्र लिखने का चलन नहीं है. फिर भी बड़ी शिद्दत से इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं, क्योंकि, सुना है कि इस जहां में जिस चीज़ बड़ी शिद्दत से चाहो, उसे प्राप्त करने में पूरी क़ायनात मदद करती है. क्या पता, मेरा यह संदेश किसी तरह तुम तक पहुंच ही जाए. ना भी पहुंचे, तो ग़म नहीं. बस तसल्ली रहेगी कि मैंने कोशिश की.
बात ये है कि तुम्हारे सुसाइड नोट के जिस अंश का मैंने उपर उल्लेख किया है, उसने मुझे रात भर जगाए और रुलाए रखा. वाकई तुम अच्छा लिखते थे दोस्त. पर तुम्हारे लिखे शब्दों की अच्छाई के बजाए उसकी सच्चाई ने मुझे ज्यादा परेशान किया. लगा, जैसे मेरी खुद की भावनाएं ही तुम्हारे सुसाइड नोट पर उतर गई हों. दुखद यह है कि हमारी स्थितियां तो एक जैसी हैं, पर हमने जीवन को लेकर फैसले अलग-अलग लिए हैं. तुम्हें विज्ञान से प्यार था, सितारों और प्रकृति से भी. मुझे स्वतंत्र विचारों से प्रेम है और इससे जुड़ी दूसरी चीज़ों से भी. इस जहान का हर प्राणी किसी ना किसी चीज़ से प्यार तो करता ही है. लोगों का ढकोसला-दिखावा मुझे भी कचोटता है. और सिर्फ अपनी बात क्यों करूं. कौन है यहां, जो इन चीज़ों का शिकार नहीं होता? आदमी कभी नेता बन के, कभी अभिनेता बन के, तो कभी सगा रिश्तेदार बन कर भी ठगी करता रहा है, करता रहेगा.
तुम भावनाओं के दोयम दर्जे का होने पर निराश थे, पर दोस्त इसका स्तर कब और किस काल में ऊंचा था? प्यार में छल-धोका कब नहीं था? मान्यताएं कब संकीर्ण नहीं थीं? कृत्रिम संस्कारों से बंधा मानव कब अपने सोच-विचार से मौलिक था? दोस्त, तुमने कभी कोई ऐसी प्रेम कहानी सुनी, जिसमें दुख का नामोनिशान नहीं था?
तुम्हारी लिखी तमाम वजहें दुख का सबब तो हैं, पर इसके लिए खुद को खत्म कर लिया जाए यह निर्णय कम से कम मेरी समझ से परे है. सिर्फ तुम ही नहीं, हम में से हरेक तुम्हारे आख़िरी ख़त में लिखी विडम्बनाओं और अंतर्विरोधों का शिकार है. यहां हमारी हर सांस पर मौत हावी होने की कोशिश करती है. पर क्या करें, मौत को कैसे जीतने दें? निसंदेह, तुम हम सब से ज्यादा सजग और संवेदनशील रहे होगे. इसलिए शायद आहत भी ज़्यादा हुए. हमने थोड़ा-बहुत ही सही समझौता करना सीख लिया है. पीएचडी तक की पढ़ाई तुम्हें शायद वह नहीं सिखा पाई.
बाबा साहेब को निश्चित तौर पर तुम मुझसे बेहतर जानते होगे. कैसे उनका कठिन जीवन भी तुम्हें प्रेरणा नहीं दे पाया? मुझे समझाओ कि आत्महत्या करने वाले किसानों या मौत को गले लगाने वाले असफल प्रेमी-प्रेमिकाओं से मैं तुम्हें कैसे अलग मानूं. हममें से हर कोई किसी ना किसी रूप में दलित है. जिसके पास सत्ता नहीं है, पावर नहीं है, वह यहां दलित है. इसी समाज से लड़कर तुम हैदराबाद तक पढ़ने जा सके, फिर इस लड़ाई को बीच में छोड़ देने की क्या वजह रही होगी, मैं समझ नहीं पा रहा.
हममें से कईयों का बचपन अच्छा रहा है. पर मलाला यूफ़जई भी तो इसी ज़माने में पैदा होती है. गांधी भी तो यहीं ट्रेन से धकेले जाने के बाद भी आत्महत्या नहीं करते. हम में से कई तो अपने दुखद जीवन की राह में अकेले ही घिसट रहे हैं, हममें से कई को तो अपने जीने की वजह तक पता नहीं. पर तुम्हारे पास तो एक संगठन था, लोग थे, संघर्ष की एक वाजिब वजह थी और सबसे बड़ी बात की एक सपना था...लेखक बनने का सपना! ढिबरी की राख से छपाई करने वाले प्रेमचंद के देश में एक प्रतिभावान लेखक का यूं मौत को गले लगा लेना, मुझे बेचैन करता है.
मुझे यकीन है कि तुम जहां कहीं भी होगे अपने फैसले पर खुश नहीं होगे. थोड़ा ही सही, तुमहें पछतावा ज़रूर होगा. दोस्त, इस ज़माने को तुम्हारे जैसे संजीदा लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत है और आगे भी रहेगी. हो सके तो वापस इसी ज़माने में इंसान बन कर ही लौटने की कोशिश करना और इस बार अपने अधूरे सपने को ज़रूर पूरा करना.
तुम्हारे सुसाइड नोट का एक पाठक
समीर रंजन
लेखक- द सोशल एनिमल.co.in
(सोशल मीडिया पर आधारित पहला हिंदी उपन्यास)