Friday, January 20, 2012
बेमतलबी दुनिया
Sunday, June 19, 2011
बाप तो बाप होता है...

फोर वन फोर वन को हिंदी में क्या कहते हैं...बचपन में हम दोस्त, अपनी जमात में शामिल होने वाले किसी भी नए बंदे से ये सवाल पूछा करते थे. हमें अक्सर पता होता था कि अगला बंदा जवाब नहीं बता पाएगा...सो जवाब बताने से पहले उसे हिंट दे- देकर और परेशान करते थे. अबे वहीं जिससे तू डरता है. जो घर में हमेशा तेरे पास होता है....पर जबाव किसी को आता हो, तब तो आए. आखिर में हम बंदे को बताते कि हम तेरे पापा की बात कर रहे थे. फोर वन फोर वन, हुए न पापा...आगे चलकर ये हम भाईयों के बीच कोडवर्ड बन गया. कोई शरारत चल रही हो और पापा की साइकिल की आवाज़ या घंटी सुनाई पड़ी नहीं कि सब चौकना...सूचना तुरंत युद्धस्तर पर प्रसारित कर दी जाती कि फोर वन फोर वन इज़ कमिंग. पर बाप से जीत पाना सचमुच मुश्किल होता है. पापा को हमारी शैतानी को भांपने में ज्यादा समय नहीं लगता था. कोई न कोई क्लू वो खोज ही लेते और फिर शैतानी का सारा रहस्य सामने आ जाता और डांट पड़नी शुरू होती. मैं मन ही मन सोचता कि व्योमकेश बक्शी का सीरियल तो ये देखते नहीं...और न ही हमें देखने देते हैं, िफर ये हमारी बदमाशियों के सुबूत-सुराग खोज कैसे लेते हैं. मेरे पापा एयरफोर्स में थे, अभी रेलवे में हैं...सो मन ही मन मेरा बालसुलभ मान बैठा था कि ये एयरफोर्स का ही असर होगा. जरूर वो ऐसी कोई खुिफया ट्रेनिंग देते होंगे ताकि दुश्मन देश की हर चाल-चालाकी हमारी फोर्स को समझ में आ जाए. इसी सोच ने मुझे सतर्क और सीधा दोनों कर दिया. बहुत बाद में सास भी कभी बहु थी सिरीयल के टाइटल को समझने के बाद समझ में आया कि बाप भी कभी बेटा था. वैसे अब नए ज़माने के बच्चों की शैतानियों का स्तर और तरीका दोनों बदल गया है. आम-अमरूद चुराने का ज़माना गया. अब तो शैतानियां भी हाईटेक हो गई हैं. आपने टीवी के किसी चैनल को चाइल्ड लॉक किया तो घर का राजकुमार लॉक तोड़ने का नुस्खा खोज लाएगा. ऐसे में कई बार संदेह होने लगता है कि क्या आगे आने वाली पीढ़ी की शैतानियों को भावी बाप समझ पाएंगे. शायद नहीं...संस्कार और संस्कृति का अभाव नई पीढ़ी में दिखाई देने लगा है...उससे तो यही साबित होता है. िफलहाल हमारे बाप तो हर मामले में हमारे बाप रहेंगे, लेकिन आगे का भगवान जाने...
Wednesday, May 12, 2010
निरूपमा का भूत

निरूपमा का भूत
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निरूपमा की हत्या की गई या उसने खुदकुशी की, इस रहस्य से अभी पर्दा नहीं उठ पाया है. शायद इसमें अभी कुछ और वक्त लगेगा. लेकिन निरूपमा की मौत के बाद पैदा हुआ भूत हर विजातीय प्रेमी जोड़े को डराने ज़रूर लगा है. मॉडर्न ज़माने के जोड़े जिस जात-पांत की खाई को पुराने ज़माने की चीज़ मानकर भूल से गए थे, जिनकी दिलचस्पी अपने पार्टनर का दिल का हाल जानने में ज्यादा थी, अब अपने लव पार्टनर की जाति डिस्कवर करने के बाद से आतंक के साये में जीने लगे हैं. अख़बार और न्यूज़ चैनलों पर निरूपमा और प्रियभांशु की पुरानी मुस्कुराती तस्वीरों में इन जोड़ों को अपने अक्स की परछाइयां नज़र आने लगी हैं. सड़ी-गली सामाजिक संरचनाओं के बजाए व्यक्तित्व और वयक्तिगत आर्थिक दशा को तरजीह देने और प्रभावी मानने वाला युवा वर्ग निरूपमा की मौत के बाद से सकते में हैं. उसे अपने पढ़े-लिखे मां-बाप भी संकीर्ण मानसिकता वाले जल्लाद सरीख़े नज़र आने लगे हैं. बेटे या बेटी की पसंद के ख़िलाफ जाकर मोटा दान-दहेज देकर स्वजातीय शादियां करवाने वाले मां-बाप का हठ इन युवाओं के लिए अबूझ पहेली बन गया है. मैनेजमेंट, साइंस या मैथमैटिक्स का कोई भी किताबी फॉर्मूला इस पहेली को सुलझाने में मददगार साबित नहीं हो रहा है. निरूपमा के पिता को टीवी स्क्रीन पर बेटी की मौत पर गमज़दा होने के बजाए सनातन धर्म के उपदेशों की बखिया उधेड़ते देखना, देश के युवाओं के लिए किसी हॉरर फिल्म को देखने के बाद होने वाले एहसास की तरह है. ख़ैर, मां-बाप और प्रेमी की बात छोड़िए, यहां तो कानून की रखवाली पुलिस और पोस्टमार्टम करने वाले सरकारी अस्पताल के कर्मचारी भी विलेन की भूमिका में नज़र आ रहे हैं. क़ानून पर भरोसा तो है, लेकिन समाज के धिनौने जर्म्स पहले भी जता चुके हैं कि उन्हें कानून की परवाह नहीं. हरियाणा की खाप जमात पहले भी कत्लेआम कर चुकी है और आगे के लिए आए दिन धमकाती भी रहती हैं. नेता और उनकी पार्टियां भी अगर वोट बैंक लूटने के चक्कर में इस खाप पंचायत के साथ प्यार की मांडवाली कर लें, तो कोई ताज्जुब नहीं होगा.
भूत भी दो मिजाज़ के होते हैं. अच्छे और बुरे. उम्मीद है अधूरे प्यार का दर्द लिए दुनिया से रूख्सत हुई निरूपमा का भूत अपनी अच्छाई के डर से सबको डराने में ज़रूर कामयाब होगा. एक शीतल पेय के विज्ञापन की पंच लाइन यहां लिखनी रेलीवेंट लगती है- क्योंकि डर आगे जीत है.
Monday, February 22, 2010
कोड़ा कांड में नया ख़ुलासा
एक बार फिर मधु कोड़ा घोटाला मामले में भाजपा नेता और जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा सीट के पूर्व विधायक सरयू राय ने मीडिया के सामने बड़ा ख़ुलासा किया है. सरयू राय ने मीडिया को एक सत्रह मिनट लंबी एडिटेड ऑडियो सीडी जारी की है. सरयू राय का दावा है कि इस सीडी में मनोज पुनमिया की आवाज़ रिकॉर्ड की गई है. मनोज पुनमिया मधु कोड़ा घोटाला मामले में मुख्य अभियुक्त है. ये शख्स मूल रूप से मुम्बई का रहने वाला है और पेशे से सोनार है. पुनमिया से कोड़ा की पुरानी पहचान रही है. कोड़ा पहले भी गहने ख़रीदने के लिए इस शख्स से संपर्क साधते रहे हैं. सोमवार को जमशेदपुर में जारी की गई इस सीडी में कथित तौर पर मनोज पुनमिया की किसी बेनाम शख्स से साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड किया गया है. सीडी की ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं है, लेकिन बातों ही बातों में पुनमिया ने अपने कई जुर्म क़बूले हैं. पुनमिया ने साफ तौर पर कोड़ा एंड कंपनी में शामिल सभी लोगों के लिए की गई ख़ातिरदारी का ज़िक्र किया है. पुनमिया ने ये भी बताया है कि कोड़ा एंड कंपनी ने कैसे उसके साथ डबल क्रॉस का गेम खेला और फिर उनके बीच आपस में ही अविश्वास पनपने लगा. मुम्बई का काम देखने वाले कोड़ा के इस गुर्गे ने आयकर निदेशक उज्ज्वल चौधरी को मैनेज न कर पाने की बात भी इस सीडी में क़बूल की है. उज्ज्वल चौधरी वही अधिकारी हैं, जिनका अचानक ट्रॉन्सफर किए जाने की वजह से इन दिनों झारखंड में बवाल मचा हुआ है. इसके अलावा पुनमिया ने ये भी बताया है कि न्यूक्लियर डील से ठीक पहले हवाला के तहत उसने करोड़ों रुपए एक विदेशी बैंक अकाउंट तक पहुंचाए थे. सरयू राय को ये ऑडियो ई-मेल के जरिए kapoorfilms@gmail.com की ई-मेल आईडी से भेजा गया है. ई-मेल भेजने वाले शख्स ने अपना नाम तरुण कपूर बताया है. अब सरयू चाहते हैं कि उन्हें भेजी गई ऑडियो फ़ाइल की फॉरेंसिक जांच कर इसकी सत्यता को परखा जाए. ये पता लगाया जाए कि ये आवाज़ वास्तव में मनोज पुनमिया की है या नहीं. और अगर जांच में ये साबित हो जाता है कि उन्हें भेजी गई आवाज़ पुनमिया की ही है, तो फिर इसका इस्तेमाल कोड़ा एंड कंपनी पर लगे आरोपों को साबित करने में किया जाए.
माई नेम इज़ ममता, एंड आई एम अड़ियल

ममता दीदी के लिए इस बार रेल बजट पेश करते हुए बिहार को बिल्कुल से नज़रअंदाज़ करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होगा. बिहार में चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, ऐसे में जाहिर तौर पर कांग#ेस आलाकमान ने ममता पर बिहार पर मेहरबान होने का दबाव बनाया होगा. वैसे बंगाल में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए रेल बजट में बिहार औौर बंगाल पर होने वाली मेहरबानियों का राजनीतिक चश्मों से विशलेषण किया जाना तय है. इधर लालू अपना आजीवन रेल पास छिन जाने और जांच के चक#व्यूह में फंसाए जाने की वजह से ममता दीदी से पहले ही खार खाए बैठे हैं. इस बार भी अगर रेल बजट पेश करते हुए ममता और लालू के बीच की तीखी नोंक-झोंक देखने को मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. बिहार के मुख्यमंत#ी नीतीश कुमार पहले ही दीदी को अपनी नई रेलों की डिमांड लिस्ट सौंप चुके हैं. और इस लिस्ट की ज़रा सी भी उपेक्षा नीतीश बर्दाश्त करेंगे, ऐसा लगता नहीं. बजट में अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की दिशा में कोई ठोस संकेत नहीं दिखाई दिया तो नीतीश इन दोनों मुद्दों को जाहिर तौर पर चुनावी मंचों पर भंजाने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे. आम बिहारियों की बात करें, तो कोहरे के मौसम में रेलवे में मचने वाला कोहराम और जन आंदोलनों के नाम पर रेल पर पड़ने वाले पत्थरों और आगजनी की घटनाओं से निपटने के लिए दीदी क्या कदम उठाती हैं, इसपर सबकी निगाहें रहेंगी. इसके अलावा नक्सली इलाकों में आए दिन निशाना बनने वाली रेल और रेल पटरियों की सुरक्षा के लिए दीदी कुछ कर रही हैं या नहीं, ये जानने में भी हर किसी की दिलचस्पी होगी. लेकिन दिक्कत ये है कि ममता दबाव बनाने के लिए जानी जाती हैं, ना कि दबाव बर्दाश्त करने के लिए. इसलिए रेल बजट देखने-सुनने के बाद अगर वो माई नेम इज़ ममता, एंड आई एम अड़ियल टाइप का डायलॉग बोलती नज़र आएं, तो ताज्जुब नहीं होगा.
Sunday, September 20, 2009
"एई बोछेर कि आछे दादा"

इस साल क्या है, भइया? हर साल की तरह इस बार फिर दुर्गापूजा से ठीक पहले इस सवाल ने मेरे भीतर उधम मचाना शुरू कर दिया है. बचपन का बड़ा हिस्सा बंगाल के एक छोटे से शहर में बीता है. सो अब भी दुर्गापूजा का ज़िक्र आने पर वहां का सामुदायिक भवन और उसमें स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा आंखों के आगे तैरने लगती है. पर मेरे मालगुड़ी टाइप के इस शहर की दुर्गापूजा को याद रखने की दूसरी कई वजहें भी हैं. ऐसी ही एक वजह हैं, मलय दा. मलय दा, द पेंटर. पतली-दुबली कदकाठी + पावर लेंस वाले चश्मे से ढंकी आंखें + खिचड़ी बाल + अधपकी दाढ़ी + बेतरतीब सा पहनावा = मलय दा का हुलिया. पर दादा की सबसे पक्की पहचान है, उनके चेहरे पर हरदम मौजूद रहने वाला दार्शनिकों वाला एक्सप्रेशन. मेरे मालगुड़ी में मलय दा और दुर्गापूजा को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है. सामुदायिक भवन में होने वाली दुर्गापूजा की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है. कैसा पंडाल बनेगा, कैसी सजावट होगी, कैसी लाइटिंग होगी और यहां तक कि चंदे की रकम भी वही तय करते हैं. इतनी पूछ होने की वजह भी है. मेरे मालगुड़ी को अगर सेंटर मान लिया जाए, तो दस-बीस किलोमीटर की परिधि में दादा के टक्कर का कोई पेंटर अब तक पैदा नहीं हुआ है. इसलिए, दुर्गापूजा के मौके पर उनकी कलाकारी देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. मलय दा भी अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. दरअसल, दादा जो मूर्ति गढ़ते हैं, वो यों तो मां दुर्गा की आम प्रतिमा की तरह की ही होती है, लेकिन इस मूर्ति का बैकग्राउंड और उससे जुड़ी कई दूसरी दिलचस्प चीज़ें उसे बेहद ख़ास बना देती हैं. दादा जो बैकग्राउंड उकेरते हैं उसमें प्रजेन्ट टेन्स की झलक होती है. देश-दुनिया के संदर्भ में मौजूदा साल की कोई बड़ी घटना, कोई बड़ा हादसा या फिर कोई बड़ी कामयाबी उनके बैकग्राउंड का सब्जेक्ट बनती है. जुरासिक पार्क हिट होती है, तो मां दुर्गा भी जुरासिक एरा में डायनासुर का वध करती नज़र आती हैं. संसद पर हमला होती है, तो मां आतंकीसुर का नाश करती दिखाई देती हैं. पिछले साल बिहार में बाढ़ से मची तबाही के मंजर को मलय दा ने बैकग्राउंड का सब्जेक्ट चुना था. मतलब ये कि मलय दा दुर्गा पूजा को बिलकुल रेलिवेंट बना देते हैं. दुर्गा माई की प्रासंगिकता बढ़ा देते हैं. ये तो हुए दादा के काम के प्लस प्वाइंट्स. पर दादा के काम करने का तरीका भी कम निराला नहीं है. दादा अपने काम में जेम्स बॉन्डिया किस्म की सिक्रेसी मेनटेन करते हैं. दुर्गापूजा के आने की सुगबुगाहट हुई नहीं कि दादा के यहां-वहां दिखाई देने की प्रोबैब्लिटी डिक्रीज़ होनी शुरू हो जाती है. खुद को कम्युनिटी हॉल की चाहरदीवारी में नज़रबंद कर लेते हैं. बोलचाल-बातचीत सबकुछ बेहद लिमिटेड हो जाती है. मलय दा नहीं चाहते कि नियत समय से पहले किसी को उनके द्वारा तैयार किए जा रहे बैकग्राउंड का सब्जेक्ट पता चले. महालया के पंद्रह दिन पहले से ही कम्युनिटी हॉल बिल्कुल सीलबंद कर दिया जाता है. महालया के बाद तो उनके हेल्पर के भी भीतर जाने पर पाबंदी लग जाती है. कहने का मतलब ये कि मलय दा की परछाईं से भी अगर इस समय बैकग्राउंड के सब्जेक्ट के बारे में पूछा जाए, जो वो भी कंधे उचका देगी. बचपन में बैकग्राउंड का सिक्रेट जानने की मैंने कई कोशिशें कीं. मौका पाकर कम्युनिटी हॉल में ताक-झांक करने की कोशिश की, दादा के बाल-बच्चों को बिस्कुट-चॉकलेट खिलाकर इन्फॉर्मेशन हासिल करने की कोशिश की, कई बार तो सीधे-सीधे दादा से भी पूछा- "एई बोछेर कि आछे दादा". पर दादा की जुबान टस से मस नहीं हुई.खैर, मुझे दादा के इस तुगलकी और हिटलर किस्म के रुख को लेकर शिकायत है भी और नहीं भी. दरअसल, कलाकार की कला अनोखी तभी मानी जाती है, जब उसका कोई जोड़ न मिले. दादा भी अपनी रचना को कॉपी-पेस्ट किए जाने से बचाने के लिए ही ऐसा करते होंगे. पर मेरे पेट में तो आज भी बैकग्राउंड का सीक्रेट जानने के लिए मरोड़ें उठती हैं. अपने मालगुड़ी से कोई हजार-पंद्रह सौ किलोमीटर दूर बैठा मैं आज भी दादा के सब्जेक्ट की गेसिंग करने में लगा हूं. लालगढ़, सिंगूर, आइला, माइकल जैक्सन, सूखा, जेनरल इलैक्शन, आर्थिक मंदी जैसे कई विषय हैजो दिमाग में घुमड़ रहे हैं. पर असलियत का पता तो सप्तमी को ही चलेगा. जब मां की प्रतिमा पर से पर्दा हटाया जाएगा.
Thursday, September 17, 2009
राजनीति पर रैबिज का ख़तरा

हम और आप आम हैं. इम्तियाज अली की भाषा में मैंगो पीपुल. मेरा बस चले तो संविधान की प्रस्तावना की स्टार्टिंग लाइन के " वी द पीपुल" में भी संशोधन करके इसे " वी द मैंगो पीपुल" में बदल दूं. लेकिन ऐसा करने के लिए मुझे आम से ख़ास होना पड़ेगा. और अगर भूल-चूक से एक बार मैं ख़ास बन गया, तो फिर भला मैं आम की परवाह क्यों करूंगा. संविधान से छेड़-छाड़ तो फिर भी की जा सकती है, लेकिन राजनीति की मूल अवधारणा से छेड़खानी करना मेरे बस का नहीं है. एक बार गांधी बाबा ने ऐसा अटैम्पट लिया था. धर्म और राजनीति को जोड़कर एक सेनटेन्स कहा था. लेकिन ख़ास लोगों ने इस सेनटेन्स की ऐसी बखिया उधेड़ी कि आम के दिमाग का मैंगो शेक बन गया. अभी सुना कि कांग्रेस आलाकमान ने अपने मंत्रियों से खर्च में कटौती करने को कहा है. आलाकमान और कई आला नेताओं ने इकनॉमी क्लास में हवाई सफर कर बाकियों पर दबाव बढ़ा दिया है. राहुल बाबा भी ट्रेन से घूम रहे हैं. ये बात अलग है कि कुछ नामुरादों ने उनकी बोगी पर पत्थर फेंक कर अपने नापाक इरादों की झलक दिखा दी है. पर मुझे तो कुछ दूसरा ही डर सता रहा है. राजनीति की मूल अवधारणा से हो रही इस छेड़खानी ने मेरी नींद उड़ा दी है. दरअसल, आम आदमी को सपने देखने की लत होती है. आम आदमी मुंगेरी लाल होता है और दिक्कत ये है कि वो हमेशा हसीन सपने ही देखता है. आम आदमी ऐसा कार्टून कैरेक्टर होता है, जो आर.के लक्ष्मण के कार्टून से भी कुछ नहीं सीखता. अमां यार कितनी बार तो सेंसेक्स औंधे मुंह गिया और सरपट उपर चढ़ा. लेकिन दलाल स्ट्रीट के आगे बैठे भिखारी का ना तो कुछ बिगड़ा और ना ही कुछ सुधरा. अब इस मौजूदा छेड़-छाड़ से आम को लगता है कि ख़ास की अक्ल ठिकाने पर आ गई है. पर आम आदमी भूल जाता है कि जैसे आम की कई वैराइटी होती हैं, उसी तरह ख़ास की भी कई वेराइटी हैं. कुछ ख़ास, कुत्ते की दुम से इंसपायर्ड होते हैं. किसी ने दुम सीधी करने की हिमाकत की नहीं, कि बिल्कुल कटखने बन जाते हैं. कई बार तो ख़ास की जमात वालों को भी काटने में गुरेज नहीं करते हैं. नतीजा ये होता है कि राजनीति में रैबिज फैलने लगता है. फिर या तो पीड़ित ख़ास को लॉन्ग ट्रीटमेंट से गुजरना पड़ता है, या फिर रैबिज के बुरे असर से वो भी काटने वालों की सुर से सुर मिलाकर भौंकना शुरू कर देता है. पर आम की सोच पर तो ताला जड़ा है. वो यही सोच कर खुश है कि चलो ख़ास भी अब आम की राह पर चलने की सोच रहा है. वो आम ऐसा सोचता है, जिसके लिए सवारी का मतलब अब भी साइकिल, रिक्शा, तांगा, नाव, बस और लोकल ट्रेन जैसी चीज़े ही हैं. वो आम ऐसा सोचता है, जो अब भी मंजिल तक पहुंचने के रास्ते का ज्यादातर सफर पैदल ही तय करता है. वो आम ऐसा सोचता है, जो शायद अब भी अक्ल से पैदल (माफ कीजिएगा) है.
